हनुमान
भजन र मन्त्र
८ मिनेट- पञ्चमुखी हनुमान कवच: ध्यानकवच३ मिनेट
सुदर्शन संहितामा पाइने पञ्चमुखी हनुमान कवचको ध्यान भाग मात्र: वानर, नरसिंह, गरुड, वराह र हयग्रीवका पाँच मुख र दश हातका आयुधको वर्णन। कवचका बीज र प्रयोग मन्त्र यसमा समावेश छैनन्।
शब्द
॥ ध्यानम् ॥ वन्दे वानरनारसिंहखगराट्क्रोडाश्ववक्त्रान्वितं दिव्यालङ्करणं त्रिपञ्चनयनं देदीप्यमानं रुचा । हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भाङ्कुशादीन् हलान् खट्वाङ्गं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिदर्पापहम् ॥ ईश्वर उवाच अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वाङ्गसुन्दरि । यत्कृतं देवदेवेशि ध्यानं हनुमतः परम् ॥ १ ॥ पञ्चवक्त्रं महाभीमं त्रिपञ्चनयनैर्युतम् । बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम् ॥ २ ॥ पूर्वं तु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम् । दंष्ट्राकरालवदनं भ्रुकुटीकुटिलेक्षणम् ॥ ३ ॥ अन्यत्तु दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम् । अत्युग्रतेजोज्वलितं भीषणं भयनाशनम् ॥ ४ ॥ पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वज्रतुण्डं महाबलम् । सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ॥ ५ ॥ उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं महोज्ज्वलम् । पातालसिद्धिवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ॥ ६ ॥ ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् । एतत्पञ्चमुखं तस्य ध्यायतामभयङ्करम् ॥ ७ ॥ खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशाङ्कुशसुपर्वतम् । मुष्टिद्रुमगदाभिन्दिपालज्ञानेन संयुतम् ॥ ८ ॥ एतान्यायुधजालानि धारयन्तं यजामहे । प्रेतासनोपविष्टं तु सर्वाभरणभूषितम् ॥ ९ ॥ दिव्यमालाम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ १० ॥ पञ्चास्यमच्युतमनेकविचित्रवीर्यं श्रीशङ्खचक्ररमणीयभुजाग्रदेशम् । पीताम्बरं मकुटकुण्डलनूपुराङ्गं उद्योतितं कपिवरं हृदि भावयामि ॥ ११ ॥ मर्कटेश महोत्साह सर्वशोकविनाशक । शत्रून् संहर मां रक्ष श्रियं दापय मे प्रभो ॥ १२ ॥ चन्द्राभं चरणारविन्दयुगलं कौपीनमौञ्जीधरं नाभ्यां वै कटिसूत्रयुक्तवसनं यज्ञोपवीतं शुभम् । हस्ताभ्यामवलम्बिताञ्जलिपुटं हारावलिं कुण्डलं बिभ्रद्दीर्घशिखाप्रसन्नवदनं वन्द्याञ्जनेयं भजे ॥
स्रोत र अनुमति: RealNepal recitation (Gemini voice) · text: sanskritdocuments.org
- हनुमान चालीसास्तोत्र५ मिनेट
गोस्वामी तुलसीदासले सोह्रौँ शताब्दीमा अवधीमा रचेको हनुमानको स्तुति: सुरु र अन्त्यमा दोहा, बीचमा चालीस चौपाई। यहाँ गाइएको होइन, वाचन गरिएको छ।
शब्द
॥ दोहा ॥ श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनऊँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवनकुमार । बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥ ॥ चौपाई ॥ जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥ १ ॥ राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥ २ ॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ ३ ॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ॥ ४ ॥ हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥ ५ ॥ संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ॥ ६ ॥ विद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥ ७ ॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लखन सीता मन बसिया ॥ ८ ॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ॥ ९ ॥ भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचंद्र के काज सँवारे ॥ १० ॥ लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥ ११ ॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥ १२ ॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ॥ १३ ॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ॥ १४ ॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥ १५ ॥ तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥ १६ ॥ तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥ १७ ॥ जुग सहस्र जोजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥ १८ ॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥ १९ ॥ दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥ २० ॥ राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥ २१ ॥ सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ॥ २२ ॥ आपन तेज संहारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥ २३ ॥ भूत पिसाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥ २४ ॥ नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ॥ २५ ॥ संकट तें हनुमान छुड़ावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥ २६ ॥ सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ॥ २७ ॥ और मनोरथ जो कोई लावै । सोई अमित जीवन फल पावै ॥ २८ ॥ चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥ २९ ॥ साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥ ३० ॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥ ३१ ॥ राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥ ३२ ॥ तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ॥ ३३ ॥ अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥ ३४ ॥ और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेई सर्ब सुख करई ॥ ३५ ॥ संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥ ३६ ॥ जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरु देव की नाईं ॥ ३७ ॥ जो सत बार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ॥ ३८ ॥ जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥ ३९ ॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥ ४० ॥ ॥ दोहा ॥ पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥
स्रोत र अनुमति: RealNepal recitation (Gemini voice) · text: sanskritdocuments.org
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